Approaches/Paradigms of Cognitive Psychology(संज्ञानात्मक मनोविज्ञान के उपागम)
पैराडाइम का तात्पर्य उस संगठित ज्ञान से है जो प्रस्तावकों ( proponents) के दृष्टिकोण से उपयुक्त हो। इसमें उन अभिग्रहों को सम्मिलित किया जा सकता है जिसे अनुसंधानकर्ता गोचर के अध्ययन के समय अभिग्रहीत करता है। पैराडाइम इस तथ्य को ओर भी संकेत करते है कि अनुसंधान के लिए कौन-सी प्रायोगिक विधियाँ और माप उपयुक्त है।इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि -
"Paradigms are intellectucal frameworks that guide investigators in studying and understading phenomenon."-Galotti 2001, Cognitive Psychology.
यहाँ हम संज्ञानात्मक मनोवैज्ञानिकों द्वारा प्रयोग किये जाने वाले तीन उपागमों/पैराडाइम्स का उल्लेख करेंगे-
(1) सूचना-संशाधन उपागम (The Information Processing Approach)
1960 से 1970 के बीच इस उपागम का प्रभुत्व संज्ञानात्मक मनोविज्ञान में बना रहा परन्तु आज भी इसका महत्व कम नहीं हुआ है और यह एक प्रबल उपागम के रूप में स्वीकार किया जाता है। यह उपागम मानवसंज्ञान (hunan cognition)एवं कम्प्यूटरीकृत सूचना संशाधन ( computerized processing of information)के मध्य सादृश्यता(analogy) प्राप्त करने का प्रयास करता है।
इस उपागम का प्रमुख अभिग्रह यह है कि किसी प्रणाली (मस्तिष्क ) के द्वारा प्राप्त सूचना ( देखना, सुनना, पढ़ना,
चिन्तन ) के रूप में संज्ञान होता है। इन सूचनाओं का संशाधन–ग्रहण (receive ), संग्रहण ( store ), पुनः कूट संकेतन(recode), रूपान्तरण ( transformation ), पुनप्राप्ति (retrieval) होता है। द्वितीय उपागम, व्यक्ति के संज्ञानात्मक योग्यताओं को अन्तरसम्बन्धित क्षमताओं ( interrelated capacities -attention. memory, language skills) के एक प्रणाली ( system) के रूप में माना जा सकता है।इस उपागम के समर्थक इन क्षमताओं में पाये जाने वाले सम्बन्धों का विश्लेषण करके इस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास करते हैं कि व्यक्ति किसी विशिष्ट संज्ञानात्मक कार्य को कैसे निष्पादित करता है।गणक रूपक ( computer metaphor) के अनुसार, सूचना-संशाधक सिद्धांतवादी यह अभिग्रहित करते है कि गणक की भाँति व्यक्ति भी सामान्य उद्देश्य प्रतीक प्रहस्तलक (general purpose symbol manipuator) है। इसका तात्पर्य यह है कि व्यक्ति भी कम्प्यूटर की भाँति कुछ प्रतीकों (अक्षर, संख्या, दृश्य, तर्क वाक्य ) को मानसिक संक्रिया (mental operation) के द्वारा विस्मयकारी संज्ञानात्मक असाधारण कार्य एक सामान्य उद्देश्य सूचना संसाधन प्रणाली का निम्नलिखित चित्र प्रस्तुत किया गया है।
इस प्रारूप में बाक्स संग्रह ( store ) का प्रतिनिधित्व करते हैं और तीरवत रेखाएँ प्रक्रियाओं ( process )की और संकेत करती है। किसी ने इसे प्रारूप को "Boxes-and Arrows Models of Cognition" कहा है। सूचना-संशाधन परम्परा मूलतः संरचनावाद से सम्बन्धित है। इस उपागम में गणक रूपक (computer metaphor) का प्रयोग किया गया है। इसलिए यह उपागम अभियन्त्रिकी (engineering ) और सम्प्रेषण (communication) के क्षेत्र से भी सम्बन्धित है। इस क्षेत्र में कार्य करने वाले अनुसंधानकर्ता व्यक्ति एवं मौलिक क्षमताओं एवं प्रक्रियाओं में पायी जाने वाले भिन्नताओ से सम्बन्धित करने का प्रयास करता है।सूचना-संशाधन के क्षेत्र में कार्यरत मनोवैज्ञानिक अपने अध्ययनों में प्रायोगिक एवअर्द्ध-प्रायोगिक प्रविधियों का प्रयोग किया है।
(ii) सम्बन्धवादी उपागम ( The Connectionist Approach)
1980 के आसपास ही अनुसंधानकर्ताओं ने सूचना-संशाधन उपागम के विकल्प को खोजना शुरू कर दिया था ताकि संज्ञान की उपयुक्त व्याख्या कर सके। परिणामस्वरूप उन्होंने एक नये प्रारूप को प्रस्तुत किया जिसे सम्बन्धवाद(connectionism ) की संज्ञा दी जाती है जिसे कभी-कभी समानान्तर-वितरित संशाधन प्रारूप (Parallel-Distributed Processing Approach- PDP Approach) की संज्ञा दी जाती है। इस उपागम के नाम की व्युत्पति संज्ञान के उन प्रारूपों से हुई है जो सरल (एवं अनेक) संशाधन इकाइयों (processing units) में सम्बन्धों की जाल संरचना (network) से सम्बन्धित है (McCleland. 1988) क्योंकि इन इकाइयों (units) की तुलना कभी-कभी तंत्रिका कोशिकाओं (neurons) से की जाती है जिनके द्वारा विद्युतीय आवेगों ( electrical impulses) का संचरण होता है तथा जो समस्त संवेदनाओं एवं मांसपेशीय गतियों ( muscle movement) में निहित रहते हैं। इसीलिए इस प्रारूप को कभी-कभी इसे स्नायविक जाल संरचना प्रारूप (Neural Network model) भी कहते हैं।इस उपागम के अनुसार एक विस्तृत जाल संरचना में एक इकाई दूसरे इकाई से जुड़ी होती है जिनमें किसी समय विशेष पर सक्रियता का कुछ स्तर ( level of activation) पाया जाता है। इकाई की सक्रियता का स्तर क्या होगा, यह वातावरण तथा जुड़ी हुई अन्य इकाइयों पर निर्भर करता है। दो इकाइयों के सम्बन्ध का भार धनात्मक भी हो सकता है।और ऋणात्मक भी। धनात्मक भारित सम्बन्ध (positively weighted connection) एक इकाई को उत्तेजित (excite)करते हैं अथवा वे जुड़ी हुई इकाइयों के सक्रियता स्तर में वृद्धि लाते हैं जबकि ऋणात्मक भारित सम्बन्ध ( negatively weighted connection) विपरीत प्रभाव से सम्बन्धित होते हैं जो सम्बन्धित एवं जुड़ी हुई इकाइयों के सक्रियता स्तर को या तो अवरोधित करते हैं या निम्न कर देते हैं। इन इकाइयों को गाँठ (nodes) कहते हैं। इसका स्पष्ट चित्रण अधोप्रस्तुत है-
प्रत्येक इकाई दूसरे इकाई से जुड़ी है जो व्यक्ति के बारे में कुछ सूचनाओं का चित्रण करता है। इकाइयों के बीच में तीरवत रेखाएँ उत्तेजक (excitatory) अथवा धनात्मक भारित ( positively weighted) एवं संबंधित (connected)होती है। जब कोई किसी निश्चित सक्रियता स्तर पर पहुँचता है तो यह धनात्मक भारित समस्त इकाइयों को उत्तेजित कर देता है। इस उदाहरण में एक वृत में सभी इकाइयाँ ऋणात्मक भारित है जो अवरोधक के रूप में कार्य करती है अथवा सक्रियता स्तर को निम्म. (lower) करती है। इन गाठों का सक्रियता स्तर अपने-अपने वृत्त के गाँठों के सक्रियता स्तर को या तो अवरोधित करता है या निम्न करता है। उदाहरणार्थ-यदि A गाँठ में सक्रियता पाई जाती है, तो वह B,C,DE के सक्रियता को अवरोधित करेगा। उसी समय A गाँठ बीच के वृत्त में ऊपर के गांठ को उत्तेजित करता है जो बाद में दूसरे वृत्तों के गाँठों को उत्तेजित करता है।
सूचना-संशाधन एवं सम्बन्धवादी उपागमों में मुख्य अंतर उस विधि का है जिसमें संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं के घटित होने के बारे में अभिग्रहीत किया गया है। सूचना संशाधन प्रारूप में क्रमानुसार (serially) संज्ञान के घटित होने को अभिग्रहीत किया गया है जबकि सम्बन्धवादी उपागम में संज्ञानात्मक प्रक्रमों के समानान्तर रूप से घटित होने की बात की गई है। इस उपागम के अनुसार- Knowledge is not stored in various storehouses but within connections between units. Learning occurs when new connective patterns are established that change the weights of connections between units." -Galotti 2001, Cognitive Psychology: In and out of the laboratory.)
(ii) पारिस्थितिकीय उपागम (The Ecological Approach)
संज्ञान को अध्ययन करने के तीसरे प्रमुख उपागम को मनोवैज्ञानिकों और मानवशास्त्रियों (anthropologists) ने प्रस्तावित किया है जिनका विश्वास सूचना-संशाधन और सम्बन्धवादी उपगामों के विपरीत था। इनका तर्क था कि
Cognition does not occur in isolation from larger cultural contexts. All cognitive activities are shaped by the culture and by the context in which they occur"--Galotte 2001
इस उपागम के अनुसार संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं पर संस्कृति और सन्दर्भ का प्रभाव पड़ता है। यह दोनों कारक हमारे संज्ञान को स्वरूप प्रदान करते हैं।
मानव प्राणी में पाई जानेवाली मानसिक प्रक्रियाएँ चाहे वह प्रत्यक्षीकरण हो या धारणा, सभी वातावरणीय उदीपको और प्राणी के व्यवहार के बीच मध्यस्थता (mediation) का कार्य करती है। चूकि सज्ञान सूचना-ससाधन की एक प्रकिया है इसलिए हम इसकी व्याख्या इस प्रकार कर सकते है कि सर्वप्रथम प्राणी वाहा जगत से अपनी ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से उत्तेजनाएँ ग्रहण करता है फिर वह उनके बारे में साहचर्या एवं प्रतीकों के माध्यम से चिन्तन करके उन्हें प्रयास करता है (इस प्रकार उदीपक के बारे में एक संज्ञानात्मक सरचना विकसित करता ह) तत्पश्चात् उद्दापक के प्रति प्राणी उद्दीपक के प्रति सीधे अनुक्रिया नहीं करता है वरन् मध्यस्थताकारी अनुक्रियाओं के आधार पर व्यवहार प्रकट अनुक्रिया (व्यवहार) प्रकट करता है। इस प्रकार प्राणी उदीपक के प्रति सीधे अनुक्रिया (व्यवहार) प्रकट करता है। इस प्रकार प्राणी उदीपक के प्रति सीधे अनुक्रिया नहीं करता हैं वरन मध्यस्तकारी अनुक्रियाओं के आधार पर व्यवहार प्रकट करता है।
संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं से सम्बन्धित उपरोक्त तथ्यों का अवलोकन करने पर यह विदित होता है
1. संज्ञानात्मक प्रक्रिया एक जटिल मानसिक योग्यता है।
2. यह एक अर्जित योग्यता है जो जीवनपर्यन्त चलती रहती है।
3. इनमें अमूर्तीकरण (nbstraction) पाया जाता है।
4. इसमें अन्तरण (transfer) पाया जाता है।
5. इसमें प्रत्यक्षीकरण प्रक्रम घटित होता है।
6. इसमें प्रतीकों का उपयोग होता है।
7. मध्यस्थताकारी अनुक्रियाएँ अप्रत्यक्ष रूप से घटित होती हैं, इनका निरीक्षण संभव नहीं है।
8. प्राणी का संज्ञान पूर्णतः व्यक्तिगत होता है।
9. वातावरण के बारे में ज्ञान प्राप्त करने और समझकर व्यवहार करने की प्रक्रिया है।
10. बालक को आयु, शिक्षा और पूर्वानुभव में जैसे-जैसे वृद्धि होगी, संवेगात्मक क्षमता में भी वृद्धि होगी।
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